चक्र शुद्धीकरण
१. मूलाधार चक्र :
श्री माताजी कृपा करके मुझे पावन (अबोध) बना दीजिए।
२. स्वाधिष्ठान चक्र :
श्री माताजी कृपया मुझे शुद्ध विद्या तथा क्रियात्मक शक्ति प्रदान कीजिए।
३. नाभि चक्र :
श्री माताजी कृपया मुझे सन्तोष, उदारता प्रदान कीजिए।
३. भव सागर :
श्री माताजी कृपा करके मुझे स्वयं का गुरु बना दीजिए।
४. हृदय चक्र :
श्री माताजी कृपा करके मेरे हृदय को प्रेम से परिपूर्ण करके मुझे निर्भय बना दीजिए।
५. विशुद्धि चक्र :
श्री माताजी कृपया मुझे निर्लिप्त साक्षी बना दीजिए।
श्री माताजी कृपया मुझे विराट का अंग प्रत्यंग बना दीजिए।
५. हंसा चक्र :
श्री माताजी कृपया मुझे विवेक प्रदान कीजिए ताकि मैं स्वयं को सुधार सकूँ।
६. आज्ञा चक्र :
श्री माताजी कृपया मुझे क्षमाशील, त्यागवान बना दीजिए।
७. सहस्रार चक्र :
श्री माताजी कृपा करके मुझे आत्मसाक्षात्कार प्रदान कीजिए। मेरे सहस्रार में विद्यमान रहिए। मेरे आत्मसाक्षात्कार को दृढ़ कीजिए। मुझे सहजयोगी बनाने के लिए कृपया अपने प्रति मेरा समर्पण तथा कृतज्ञता स्वीकार कीजिए।
बायाँ भाग
१. मूलाधार चक्र :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं शिशु सम अबोध हूँ।
२. स्वाधिष्ठान चक्र :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं शुद्ध विद्या हूँ।
३. नाभि चक्र :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं सन्तुष्ट हूँ।
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं शान्त हूँ।
श्री माताजी मैं आपकी कृपा से उदार व्यक्ति हूँ।
३. (अ) भवसागर :
श्री माताजी आपकी कृपा से क्योंकि मैं शुद्ध विद्या हूँ अतः मैं स्वयं का गुरु हूँ।
४. हृदयचक्र :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं आत्मा हूँ। कृपा करके आत्मा के विरोध में कोई अपराध यदि मुझसे हुआ हो तो उसे क्षमा करें। श्री माताजी आपकी कृपा से मैं माँ के प्रेम का यन्त्र हूँ।
५. विशुद्धि चक्र :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं आत्मा हूँ और निर्दोष हूँ। आत्मा किस प्रकार दोषी हो सकती है?
६. आज्ञा चक्र :
श्री माताजी कृपा करके मेरे अपराधों को क्षमा करें।
७. दायाँ सहस्रार (बायाँ भाग) :
श्री माताजी आपकी कृपा से मैं सभी चुनौतियों में सुरक्षित हूँ और अपना उत्थान पाने तक सभी चुनौतियों पर मैं विजय प्राप्त करूँगा।
८. सम्पूर्ण बायाँ बाजू :
श्री माताजी मैं भाग्यशाली हूँ कि आपकी कृपादृष्टि मुझ पर है।
दायाँ भाग
१. मूलाधार चक्र :
श्री माताजी निश्चय ही आप रक्षक हन्त्री हैं।
२. स्वाधिष्ठान चक्र :
श्री माताजी मैं कुछ नहीं करता। निश्चय ही आप कर्ता हैं और आप ही भोक्ता हैं।
३. नाभि चक्र :
श्री माताजी निश्चय ही आप मेरे अन्तः स्थित महान सम्मान हैं। श्री माताजी निःसन्देह आप ही मेरी आर्थिक, पारिवारिक समस्याओं का समाधान करती हैं और मेरे कुशल-क्षेम का ध्यान रखती हैं।
३. (अ) भवसागर :
श्री माताजी निःसन्देह आप ही मेरे गुरु/स्वामी हैं।
४. हृदय चक्र :
श्री माताजी मेरे अन्दर जो जिम्मेदारी भाव है, वो आप ही हैं। निश्चित रूप से आप ही सदाचार की सीमाएँ हैं तथा प्रेममय पिता की कृपा भी आप ही हैं।
५. विशुद्धि चक्र :
श्री माताजी मेरी वाणी तथा कर्मों का माधुर्य निश्चित रूप से आप ही हैं।
६. आज्ञा चक्र :
श्री माताजी मैंने सबको क्षमा किया। अपनी गलतियों के लिए स्वयं को भी क्षमा किया। कृपा करके मुझे अपनी कृपा दृष्टि में बनाए रखिए।
७. बायाँ सहस्रार (दायाँ भाग) :
श्री माताजी निश्चय ही मेरे उत्थान मार्ग की सभी चुनौतियों पर विजय आप ही हैं।
८. दायाँ सहस्रार / दायाँ बाजू :
श्री माताजी निश्चय ही आप ही आदि शक्ति (Holy Spirit) हैं।
गणेश तत्व और सहजयोगियों का दिव्य जन्म
इस संसार में जो सबसे बढ़कर के माया है वो है पढ़त मूर्खों की। पढ़तमूर्ख उन्हें कहते हैं जिनके लिए कबीरदासजी ने कहा है,’पढ़ी पढ़ी पंडित मूरख भए’ और इसलिए मैं किताब लिखने में भी बहुत डरती थी। और जब किताब लिखने का सोचा भी है, तो भी ऐसे महामूर्खों के हाथ में वो नहीं पड़नी चाहिए। वो लोग उसी प्रकार हैं जिस प्रकार कोई इंसान किसी भी देश में नहीं जाता है और झूठी बातें सारी दुनिया में बताता है कि मैं वहाँ गया था और वहाँ पर ये देखा, फिर वहाँ ये था, फिर वहाँ वो था, फिर ऐसा हुआ और फिर किसी ने ये कहा था, उसने वो कहा था, अपनी कोई उनके पास प्रचिती नहीं होती।
लेकिन आप जो सहजयोगी हैं आप सबको इसकी प्रचिती आयी है। आपके अंदर से vibrations फूटे हैं माने ये चैतन्य बह रहा है। आपको इसका अनुभव आया है कि चैतन्य क्या चीज़ है। आप एक बड़े भारी स्थान पर बैठे हुए हैं। वो लोग बड़े बड़े भाषण दे सकते हैं इसी चैतन्य के बारे में बता सकते हैं। बहुत बड़े श्लोक पढ़ सकते हैं। लेकिन उनको अनुभूति इतनी भी नहीं हुई और वो परमात्मा के राज्य से अभी बहुत दूर हैं, आपकी entry हो चुकी है।
उसका एक विशेष कारण है, आपने पढ़ा होगा कि गणेशजी का जन्म सिर्फ उसकी माँ ने ही किया था। अपनी सृष्टि रचना से पहले ही उसने एक बेटे को जन्म दिया था। खुद माँ ने ही ये सब किया था। इसलिए कि बाद में वो पिता को जान सके और उसको एक विशेष शक्तिशाली बनाया कि उसकी ओर ब्रह्मा, विष्णु , महेश कोई भी नज़र उठा करके भी न देख सके, इतना वो शक्तिशाली था। एक विशेष रूप का वो बालक था। और उसी की पुनरावृत्ति आज इस कलियुग में हुई है।
परमात्मा की प्रेम शक्ति आपके साथ है
आपको भी मैंने अपने सहस्रार से जन्म दिया है एक विशेष रूप से इसलिए आपके अंदर vibrations छूट रहे हैं लेकिन आपमें से कितने लोग हैं जो अपनी इज़्ज़त करते हैं? अपने को समझते हैं कि हमने कोई विशेष चीज़ पाई है और उसी विशेष तरह से हमें रहना चाहिए। अपने जीवन को उसी तरह से बनाना चाहिए। आपका स्थान देवलोक से भी ऊँचा बना है। आपका वो स्थान है कि आपसे तो देवलोक भी ईर्ष्या करें। किसी देवों ने इस तरह उंगलियों के इशारे पर जागृति नहीं की गणेश छोड़कर के।
किसी भी साधु संतों से ये कार्य नहीं हुआ था जिन्होंने हज़ारों साल की तपस्या की हुई है। इतना ही नहीं कि तुम लोग पार हो गए हो तो इशारे पर कुण्डलिनी उठाते हो। और हर एक कुण्डलिनी को जाँचते हो कि ये कहाँ है और कैसे है? लेकिन इतनी बढ़ी चीज़ पाकर के भी आप लोगों ने अपनी इज़्ज़त नहीं की। या तो हमारा नसीब ही खोटा है कि हमें खोटे ही सिक्के मिले वो चल ही नहीं सकते।
आधा अधूरापन इतना अधिक है, इतना अधिक है कि कभी कभी मेरा मन ये चाहता है कि अब बंद कर दें इस सहजयोग को, अब ख़त्म करें। डाँटते भी हैं कहते भी हैं, प्यार भी करते हैं, दुलार भी करते हैं, कि सिर्फ ज़रा steady हो जाओ, steady हो जाओ, चित्त तुम्हारा कहाँ बहक रहा है? आप जानते हैं कि आपके हाथ से हज़ारों लोग ठीक हो रहे हैं। और हो सकते हैं। आपकी बीमारियाँ भाग गईं। परमात्मा की जो सर्वव्यापी All pervading जो प्रेम शक्ति है वो आपके साथ साथ हर समय घूम रही है, आपको सहारा दे रही है। आप गलतियाँ भी कर रहे हैं, वो देख रही है। आप झूठ बोलते हैं। वो भी देख रही है और आप माँ की निंदा करते हैं वो भी वो जान रही है और आप बहुत छिछोरेपन से रह रहे हैं,बहुत ही superficially आप रह रहे हो, ये भी वो जानती है।
सहजयोग के प्रति आपका committment बड़ा ही ख़राब है, ये भी ये शक्ति जानती है तो भी आपको आपको वो सहारा दे रही है। हर जगह हर घड़ी हर प्रति आपको गाइड कर रही है फिर भी आप misguided हैं। आप रूपया, पैसा और और दुनिया भर की सत्ता उसके लिए इस तरह से इतने छोटे होते जा रहे हैं। छि!छि!छि! बार बार मैं आपसे कहती हूँ कि आपका स्थान पूजनीय है आप में से एक एक की पूजा की जानी चाहिए ऐसा आपका स्थान है, भूतो न भविष्यति इस तरह से ऊंचे पद पर बिठाये गए लोग इस तरह का काम करने लग जाएँ तो दुनिया क्या कहेगी? आपका इतिहास में क्या नाम जाएगा? आप तो जानते ही हैं कि आपमें से बहुत लोगों ने पार तक किया हुआ है। और फिर गिर गए।
जिस पद पे इतने ऊँचे आप हैं उससे गिरना बहुत आसान है। सांसारिक चीज़ों में सहजयोग को नहीं देखना है। परमात्मा के स्वरुप को जानने के लिए आप यहाँ आए हैं। हमें कितना रूपया मिला इसके बारे में या हमारा क्या लाभ हुआ इसके बारे में ये सांसारिक तुच्छ चीज़ों का महत्व करना सहजयोगियों के लिए शोभनीय नहीं है। आप हमारे पास परमात्मा को माँगने आये हैं, सांसारिक चीजों को माँगने के लिए नहीं आए हैं। ना ही कुछ मेरे भाषण सुनकर झूठा ज्ञान इकठ्ठा करने के लिए आए हैं आप? नहीं। जो साक्षात् ज्ञान अंदर ही देखिये जब भी आप ज्ञान माँगें अंदर से ज्ञान बहेगा हर एक चीज़ स्पष्ट दिखाई पड़ेगी। यही ज्ञान है। बहुत हो गया अपने बाल बच्चों के लिए और अपने घर द्वार की चिंताएँ। आप विशेष स्थान पर बिठाये गए हैं जो लोग विशेष होंएगे उन्हीं से विशेष कार्य घटित होगा।
सहजयोग में गहराई से उतरिए | श्री माताजी की प्रेरणा
मानव से अतिमानव हो गये। आपके लिए यज्ञ भी दो किये थे। पहले भी आप जानते हैं कि पूरा प्रयत्न हम कर रहे हैं। आपके सब अंग कमसकम परमेश्वर को समर्पित हो जाएँ। उसी को समर्पित करना है अपने को। उसके लिए जो भी स्वच्छता होती है, जैसे कि माँ बाप जब घर आने वाला होता है तो कैसे बच्चे को धो पोंछकर के सामने presentation देती है। वही करने के लिए बड़े प्यार से हम लोग ये यज्ञ कर रहे हैं। अपने सारे चक्रों में से बहने वाली शक्तियाँ हैं उससे सब मैं आपको प्लावित कर सकती हूँ।
लेकिन आप कभी कभी ऐसे जान पड़ते हैं कि किसी दीवार से बात कर रही हूँ। किसी पत्थरों से सिर टकरा रही हूँ। ये दुष्ट, महादुष्ट मेरी बात सुनने नहीं वाले। ऐसा नहीं होना चाहिए। सहजयोग में गहरा उतरिए। सारे संसार का सुख एक तरफ है और परमात्मा के चरणारविन्द का सुख एक तरफ है। उस परम सुख को पाने के बाद मनुष्य संसार के किसी भी सुख की ओर देखता नहीं। इस तरह मनुष्य अमृत को पा लेता है उनके बाद वो क्या मृत चीज़ पीने वाला है। उस्की शक्तियाँ अनेक आपके लिए सज्ज हैं आपके हाथ से बह रही हैं। आपको समझ में नहीं आता कि किस तरह से वे वहाँ काम कर रही हैं। मैंने बार बार आपसे कहा है कि आप लोग सीख गए।
पंचमहाभूतों की जागृति और आत्मिक उत्क्रांति
आज प्रजापति का, ब्रह्मदेव का यज्ञ किया गया है। आप जानते हैं कि मनुष्य पाँच elements से बना हुआ है। और ये जो पाँच तत्व हैं उन तत्व का पूजन करने का ही मतलब ब्रह्मा का ही पूजन करना है क्योंकि ये उनके आयुध हैं। और ये भी प्रजापति को भी माँ ने ही दिए हैं। माँ के देखने से ही प्रकाश हुआ था इसलिए तेज का जो तन्मात्रा है या जो element है वो तैयार हुआ था। या essence of element कहिए तन्मात्रा का मतलब ।
माँ ने जब खुशबू ली उसी सुगन्ध से ही पृथ्वी बनी। इसी तरह से पृथ्वी तत्व आया। माँ के बोलने से ही sound का तत्व तैयार हुआ है, जिसे नाद कहिये। इस प्रकार तन्मात्राएँ वो हैं वो तैयार हुई। और तन्मात्राओं से तैयार हुए। ये सब प्रजापति का कार्य, ब्रह्मदेव का कार्य है। और ब्रह्मदेव इसलिए नहीं पूजे जाते हैं, उन को पूजा नहीं जाता इसका कारण ये है कि संसार का सब कार्य कर रहे हैं। आपका जो शरीर है आपका जो element का कार्य है वो कर रहे हैं। उसके लिए उनको पूजने की ज़रूरत नहीं है। वो अपने जगह बैठे काम कर रहे हैं।
आपको सिर्फ दो ही चीज़ों को पूजना चाहिए। एक तो शिव को जिससे कि आपका existence बना रहे, आपका अस्तित्व बना रहे, आपके प्राण बने रहें और दूसरा आपको विष्णु को जो कि आपको evolution देता है,जिससे आपकी उत्क्रांति होती है। लेकिन यज्ञ प्रजापति का करना ज़रूरी है कि आपके अंदर के जो पंचभूत हैं, आपके अंदर के जो तत्व हैं इन पंचमहाभूतों के जो तत्व हैं जिन्हें तन्मात्राएँ कहते हैं वो जागृत हो करके आपको भी उसका यश प्रदान कर सके।
पहले यज्ञ सिर्फ प्रजापति का ही होता था। और बाद में विष्णुजी का भी शुरू हुआ। शिवजी का भी यज्ञ होना चाहिये ऐसा लोग सोचते हैं लेकिन उनका यज्ञ नहीं होता है। उनका रूद्र(रुद्राभिषेक?) होता है। उसके भी कारण हैं। शास्त्र में जो कुछ विधि लिखी हुई है उनके बहुत गहरे कारण हैं। इसलिए जो भी लिखा हुआ है उसके जो भी आप follow करते हैं तो उसमें कोई blindness नहीं है, अंधता नहीं है। जबकि आपके पास vibration हैं,आप स्वयं vibration से इसकी जाँच पड़ताल कर सकते हैं कि जो ये विचार है या जो कुछ किताब में लिखा है,ये ठीक है या नहीं। बहुत से जगह कुछ कुछ ये पुस्तक में घुसेड़ दिया है हर एक पुस्तक में ये किया है।
चेतना के उत्थान का विज्ञान | सहजयोग का रहस्य
उसको भी आप देख सकते हैं अपने vibrations से ऐसे कौन जान सकता है। कौन आदमी पार है? कौन नहीं है? कौन realised है? कौन नहीं है? कौन god-realised है? कौन ordinally realised है? कौन जीवन्मुक्त है? सब कुछ आप vibrations से जान सकते हैं। आप हर एक चीज़ vibrations से जान सकते हैं। जो अचेतन में है, जो unconscious में है। जो मनुष्य ने कभी नहीं जाना। उसकी एक एक बारीक़ बारीक़ चीज़ आप समझ सकते हैं। vibrations की भी एक एक ढंग होता है, एक एक तरीका होता है, एक एक उसकी लय होती है अलग अलग।
लेकिन अभी तो basis ही नहीं बन रहा आप लोगों का। तो मैं कैसे आगे की बात सिखाऊँ? अभी तो पहली ही क्लास में बैठे हैं उसी में एक मेरे को नोंच रहे हैं। एक मेरे को घसीट रहे हैं। एक मेरे से झगड़ा कर रहे हैं बुद्धू जैसे। अपना basic पहले ठीक कर लो फिर इस vibration और एक एक चीज़ के permutation combination से आप हर एक चीज़ समझ सकते हैं जो आप जानना चाहें। इतना ही नहीं आप स्वयं भी उठते जा रहे हैं।
जैसे जैसे मनुष्य उठता जा रहा है वैसे वैसे वो ज्यादा जानते जाता है। आप जानते हैं कि जब आप नीचे खड़े थे तो आपको इतना नहीं दिखायी दे रहा था। इससे और ऊपर जायेंगे तो और आपको दिखाई देगा और अगर बहुत ऊपर चले गए और कुछ दिखाई देगा। जब आप चंद्रमा पर चले जायेंगे तो पृथ्वी और तरह से दिखाई देगी वो पूरी की पूरी घूमती हुई दिखाई देगी। उसका पूरा भ्रमण आपको दिखाई देगा। नहीं तो यहाँ बैठे बैठे तो पृथ्वी लग रही है जैसे कि चौकोर हो।
इसलिये जैसे जैसे आदमी उठता जाता है। उठने का तरीका एक ही है अपने बोझे उतारते जाइये। सब बोझों को उतार दीजिये। जैसे जैसे बोझे उतरते जायेंगे आप अपने आप ऊपर उठते जायेंगे। फालतू के बोझे मेरा बाप ऐसा, मेरी माँ ऐसी, मेरा भाई वैसा, इसको चाहिए, उसको चाहिए, मेरी सत्ता है, मेरा पैसा है, सब मूर्खता misidentification। आपको अगर पाना है तो पाइए, और अगर नहीं पाना है तो माफ़ कीजिये। दोनों चीज़ नहीं चल सकती। यहाँ आप परम् तत्त्व तो पाने के लिए, उसमें भूलने के लिए आए हैं। यहाँ पैसा कमाने के लिए आप नहीं आए हैं। यहाँ किसी तरह का भी व्यवसाय करने के लिए आप नहीं आये हैं। मुझसे कोई भी bargaining नहीं सिवाय एक चीज़ कि आपको मैं परम तत्त्व से परिचित कराऊँ।
फिर मुझे उसके लिए आपको डाँटना पड़ेगा। नाराज़ होना पड़ेगा। कभी सिखाना पड़ेगा और कभी प्यार करना पड़ेगा। अगर आप इस चीज़ के लिए उत्सुक हैं और यही चीज़ माँगने आप मेरे पास आये हैं तो ठीक है। नहीं तो मुझे क्या? मैं तो औलिया हूँ। मैं वैसे ही अपनी किताब बंद कर दूँ। तुम अपने गरज़ से आए हो मेरी गरज़ से नहीं आए हो। मेरी भी गरज़ है क्योंकि माँ को बच्चों की भी गरज़ होती ही है। लेकिन माँ अजीब है। निर्मम भी है बड़ी निर्मम है। एकदम…clearcut से सबको बंद भी कर सकती है। और उतनी ही मोहमयी और प्रेम करने वाली।
आज के यज्ञ में पूर्ण चित्त से, पूरे अपने को समर्पित करके करिये और ये वाला यज्ञ विशेष रूप से पंचतत्वों का होने के कारण आप लोगों की समझ में ज्यादा आएगा। ये जड़ तत्व पे है। लेकिन जड़ तत्त्व भी ज़रूरी होता है। अगर जड़ तत्त्व स्वच्छ ना हो तो बाकी कुछ भी नहीं बनता। और आपके जड़ तत्व ही गड़बड़ हैं। जब आपके जड़ तत्त्व स्वच्छ हो जाएंगे तो हमारा कार्य बहुत सुचारू रूप से होगा।
Reference : – 1976-0302





