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श्री गणेश अथर्वशीर्ष का हिन्दी अनुवाद

in SAHAJAYOGA HINDI
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ॐ गणपति तुम्हें नमस्कार (ॐ-अकार, ओंकार, महेश अर्थात् आस्था का प्रतीक है) तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो। इस दृश्यगत संसार में मूल तत्व जो दृश्यगत होता है स्वयं तुम ही हो अर्थात् इस विश्व की प्रत्येक वह वस्तु जो दृश्यमान है, तुम ही हो। यदि इस संसार को किसी ने बनाया है तो वे कर्ता स्वयं तुम हो और इस प्रत्यक्ष संसार को केवल तुम्हीं कर्तव्य रूपी आचरण से धारण कर रहे हो अर्थात् इसका पालन पोषण कर रहे हो।

संसार में अपरिष्ट (बेकार) हो जाने वाले पदार्थों के आहरणकर्ता भी स्वयं तुम हो। अतः तुम स्वयं इस ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण रूप में व्याप्त हो, यह तथ्य निश्चित है। तुम्हारे अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं है, आप से भिन्न सत्य की प्रतिष्ठा नहीं (खल्लिंद, इंद, खलु अर्थात् इसके अतिरिक्त और कुछ सत्य नहीं। तुम ही साक्षात् नित्य (सत्य) आत्मा हो (नित्य ही सत्य है, सत्य ही नित्य है मगर इसमें भी भेद है। नित्य स्वयं सिद्ध है और सत्य को हम सिद्ध कर सकते हैं।)

यह मेरी वाणी अर्थात् जो वचन ऊपर कहे हैं, नित्य हैं और सत्य हैं। ये संसार नित्य भी है। (अर्थात् स्वयं सिद्ध है) और सत्य भी है अर्थात् इसे सिद्ध भी कर सकते हैं।

तुम मेरी रक्षा करो, मेरी वाक्शक्ति की रक्षा करो, मेरी श्रवण (सुनने) की शक्ति की रक्षा करो, मेरी दात्री (देने की) शक्ति की रक्षा करो, मेरी कर्तव्य (रचना करने की) शक्ति की रक्षा करो, मुझे जो गुरु से प्राप्त है उसकी रक्षा करो, मेरे गुरु भाव की भी रक्षा करो, शिष्य भाव की भी रक्षा करो (अर्थात् मेरे ज्ञान की भी रक्षा करो)। पश्चिम, पूर्व, उत्तर व दक्षिण से मेरी रक्षा करो। ऊपर से, नीचे से, सब तरफ से, भली प्रकार से मेरी रक्षा करो।

तुम स्वयं वाणी हो, तुम स्वयं चित हो, तुम्हीं आनन्द स्वरूप हो और तुम ही ब्रह्माण्ड रूप हो (ब्रह्म हो) और तुम्हीं सच्चिदानन्द स्वरूप हो। तुम ही ज्ञान स्वरूप हो, विज्ञान स्वरूप हो।

ये सारा दृश्यमान और गतिशील संसार तुम्हीं से उत्पन्न होता है, तुम ही में स्थित है और तुम्हीं में लय हो जाता है और प्रलय के बाद सृष्टि के अन्त में तुमको ही प्राप्त करता है अर्थात् प्रलय के बाद सब तुम में विलीन हो जाएगा। तुम ही पंचभूत (भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश) हो, चारों वेद स्वरूप तुम ही हो।

तुम तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे हो अर्थात् उनसे ऊपर हो। तुम तीन प्रकार के शरीर या देह से परे हो, और तुम तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) से परे हो अर्थात् ऊपर हो। मूलाधार में तुम नित्य रूप से स्थित हो, तुम हो तीनों शक्ति (सत्य, चित व आनन्द) स्वरूप हो, योगीजन नित्य तुम्हारा ही ध्यान करते हैं।

विश्व के लिए तुम्हीं ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र हो अर्थात् इस विश्व की रचना, अस्तित्व (पालनपोषण) और इसके विनाशकर्ता तुम्हीं हो। लोकहितार्थ अर्थात् लोगों के हित व लाभ के लिए तुम्हीं इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा के रूप में स्थित हो जिनमें मेघ रूप में, ज्वाला रूप में, प्राण, अपान, समान रूप में (वायु के तीन रूप) प्रकाश और उष्णता रूप में ठंडक और रस रूप में स्थित हो। तुम ही पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के ब्रह्माण्ड स्वरूप में (ब्रह्म के तीन रूप भूः, भुवः, स्वः:) स्थित हो।

प्रारंभ में (ग) गकार का उच्चारण करके, उसके बाद अनुस्वार अकार का उच्चारण करें और अर्धचन्द्र बिंदु समेत उसका ध्यान करें। जब ये स्वर के साथ संयुक्त हों तब यह तुम्हारे स्वरूप के अनुरूप होगा। (गकार + अकार + अनुस्वार + अर्धचन्द्रकार) (गँ = ग+अ+ं+◌ँ) ये पूर्व लिखित मंत्र व अर्थ के अनुसार ही द्वितीय मंत्र दिया गया है और इसे गणेश विद्या कहा है। उनके स्मरण करने की विधि है जिससे गणेश विद्या का आरम्भ हुआ है। गणेश विद्या में गणक ऋषि हैं, निचृद गायत्री छंद है, गणपति देवता हैं और ॐ गं गणपतये नमः मंत्र है।

यह गं से अभिप्राय बीज से है अर्थात् जिसका हम विस्तार नहीं कर सकते। अगर अकेले गँ का भी उच्चारण करेंगे तो सम्पूर्ण तंत्र से गणपति की स्तुति का आनन्द प्राप्त होगा।

एकदंत अर्थात् गणेश को हम (विद्महे) जानते हैं। वक्रतुण्ड (सुँडवाले) गणेश को हम समझते हैं। एक दंतवाले गणेश हम सबको प्रेरणा देते हैं। वह हमारे प्रेरक हैं। श्री गणेशजी के एक दांत हैं, चार हाथ हैं, जिनमें वे पाश और अंकुश को धारण किये हैं। (पाश-बाँधनेवाली रस्सी)

एकदंत गणेश, वर देनेवाले गणेश, हाथ में मूषक अंकित ध्वज धारण किए हुए हैं, ध्वज का रंग लाल है। गणेश लंबोदर (बड़े पेटवाले) और सूप के समान कान वाले हैं और लाल वस्त्र धारण किए हैं। सुगंधित सिंदूर से जिनका शरीर या अंग-अंग सुशोभित है, वे लाल पुष्पों की माला पहने हैं। भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। संसार के कारण हैं व त्रुटिहीन देवता हैं जो सृष्टि के आदि में प्रकृति और पुरुष से भी परम या उत्तम रूप में प्रकट हुए हैं।

इस तरह से जो भी व्यक्ति नित्य प्रति, गणपति का ध्यान करता है वह योगी पुरुषों में श्रेष्ठ है। हे व्रात (समूह) के स्वामी, आपको नमस्कार है। हे गणों के स्वामी आपको नमस्कार है। शक्तिशालियों में प्रथम शक्ति के स्वामी आपको नमस्कार है। हे लंबोदर व एकदंत आपको नमस्कार है। हे शिव के पुत्र, विघ्नों के विनाशक, वरदान देनेवाले गणेश, आपको नमस्कार है।

श्री गणेश अथर्वशीर्ष

Birthday Puja felicitations, 23 March 2002, Delhi

ॐ नमस्ते गणपतये, त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि, त्वमेव केवलं कर्ताऽसि, त्वमेव केवलं धर्ताऽसि, त्वमेव केवलं हर्ताऽसि, त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि, त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥१॥

ऋतं वच्मि, सत्यं वच्मि ॥२॥

अव त्वं माम्, अव वक्तारम्, अव श्रोतारम्, अव दातारम्, अव धातारम्, अवानूचानमव शिष्यम्, अव पश्चात्तात्, अव पुरस्तात्, अवोत्तरात्तात्, अव दक्षिणात्तात्, अव चोर्ध्वात्तात्, अवाधरात्तात्, सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥३॥

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः, त्वम् आनन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः, त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि, त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते, सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति, सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति, सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति, त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः, त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥५॥

त्वं गुणत्रयातीतः, त्वं देहत्रयातीतः, त्वं कालत्रयातीतः, त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्, त्वं शक्तित्रयात्मकः, त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्, त्वं ब्रह्मा, त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥६॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्, अनुस्वारः परतरः, अर्धेन्दुलसितम्, तारेण ऋद्धम्, एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्, अकारो मध्यमरूपम्, अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्, बिन्दुरुत्तररूपम्, नादः संधानम्, संहिता संधिः, सैषा गणेशविद्या, गणकऋषिः, निचृद् गायत्रीच्छन्दः, गणपतिदेवता, ॐ गं गणपतये नमः ॥७॥

एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥८॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्, रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्, रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्।

भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्, आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं, स योगी योगिनां वरः ॥९॥

नमो व्रातपतये, नमो गणपतये, नमः प्रमथपतये, नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदन्ताय, विघ्ननाशिने, शिवसुताय, श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥१०॥

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